Teaching Methodology in Hindi: सूचना एवं संप्रेषण तकनीक

    Teaching Methodology in Hindi

    Application Form 2020


    दोस्तों Teaching Methodology के ऊपर हमने कई आलेख लिखे हैं जैसे कि Assessment and Evaluation in Hindi (आकलन और मूल्यांकन)Methods of Teaching in Hindi Exclusive for TET Exams in IndiaBasic Process of Teaching and Learning in HindiTeaching Methods (शिक्षण केरीक़े) इत्यादि। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज मैं आपको एक नए विषय Teaching Methodology in Hindi (सूचना एवं संप्रेषण तकनीक) से अवगत कराने जा रहा हूँ यदि पिछले कुछ साल के ट्रेंड्स को देखा जाय तो आप पाएँगे कि लगभग हर साल इस टॉपिक से कुछ न कुछ सवाल पूछें गए हैं।

    मुझे उम्मीद है इस आलेख को पढने के बाद शायद आप Information and Communication Technology in Hindi (आकलन और मूल्यांकन) से पूछें गए एक भी सवाल गलत नहीं करके आओगे।

    सूचना एवं संप्रेषण तकनीक
    (Information and Communication Technology in Hindi)

    सूचना एवं संप्रेषण तकनीक आज शिक्षा जगत की एक क्रांतिकारी आधारशिला बन चुकी है। इसके द्वारा शिक्षण को रोचक, अत्यधिक सक्रिय, जिज्ञासु और अच्छे तरीके से संपन्न कराया जाने वाला बना सकते हैं। हम अपने रोजमर्रा के कामों में भी सूचना संप्रेषण तकनीकी का प्रयोग करते हैं। भारत कि अगर हम बात करें तो भारत में सूचना संप्रेषण तकनीकी को राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के अंतर्गत शुरू किया गया था जो दिसंबर 2004 में शुरू किया गया।

    संप्रेषण (Communication)

    मन में आए विचारों का आदान प्रदान करना संप्रेषण कहलाता है। संप्रेषण शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द Communies से हुआ। संप्रेषण एक ऐसी प्रोसेस है जिसके अंतर्गत मनुष्य अपने विचारों का आदान प्रदान करता है। शिक्षण में संप्रेषण का अत्यधिक महत्व है। अगर हम बात करें कि संप्रेषण और शिक्षा का क्या संबंध है तो हम सीधे तौर पर बोल सकते हैं कि संप्रेषण के बिना शिक्षा और शिक्षण करना संभव ही नहीं है। अध्यापक शिक्षण के दौरान बच्चों से बातचीत करता है और उनसे कुछ प्रश्न पूछता है, उन की कमियों को दूर करता है, उनके जवाब सुनता है, यह सभी संप्रेषण के भाग होते हैं। मनुष्य भी अपने दिन प्रतिदिन और दिनचर्या में संप्रेषण का सहारा लेता है। हम अपने दिन प्रतिदिन के कार्य में संप्रेषण के माध्यम से उन्हें आसान बनाते हैं।

    होलैंड के अनुसार :- “संप्रेषण वह शक्ति है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति विशेष संप्रेषक, उद्दीपक को को इस प्रकार प्रेषित करता है कि वह दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार को परिमार्जित कर देता है।”

    जीस्ट के अनुसार :- “जब किसी सामाजिक प्रक्रिया के अंतर्गत प्रतीकों के माध्यम से किसी आशय को प्रेषित करने का प्रयास किया जाता है तो उसे संप्रेषण कहते हैं।”

    हावलैंड के अनुसार :- “संप्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक व्यक्ति विशेष, संप्रेषक किसी दूसरे व्यक्ति विशेष, संप्रेषक के व्यवहार को सामान्यतः शाब्दिक प्रतीकों द्वारा परिमार्जित करता है।”

    संप्रेषण की प्रक्रिया (Process of Communication)

    संप्रेषण हमारे बातचीत करने की प्रक्रिया है। हम अपने रोजमर्रा के जीवन में संप्रेषण प्रक्रिया को संपन्न करते हैं और इसका उपयोग करते हैं। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है :-

    1. स्रोत (Source / Sender):- संप्रेषण करते समय व्यक्ति अपने विचारों को प्रस्तुत करता है। अतः किसी सूचना को दूसरे तक भेजने वाला स्रोत कहलाता है। अर्थात कुल मिलाकर हम यहां पर यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिसके द्वारा बोला जाता है या जो सूचनाएं भेजता है उसको स्रोत बोलते हैं।

    2. संदेश ( Message ):- संदेश सूचनाओं का संग्रहण होता है जो संदेश वाहक  भेजता है। संदेशवाहक अपने मन में आए विचारों को भेजता है। संदेश किसी संकेत, कुछ चित्र, आदि के रूप में हो सकता है।

    3. एनकोडिंग ( Encoding ):- जब हम किसी विचार या भावना की अभिव्यक्ति के लिए संकेतों और प्रतीकों का प्रयोग करते हैं।

    4. माध्यम ( Medium ):- संदेश भेजने के लिए हम जिन उपकरणों का प्रयोग करते हैं उन्हें माध्यम कहते हैं। माध्यम के द्वारा हम अपनी संदेश दूसरों तक पहुंचाते हैं।  माध्यम बहुत से प्रकार के होते हैं।

    5. डिकोडिंग ( Decoding ):- यह वह प्रक्रिया होती है जिसमें संदेश प्राप्त करने वाला व्यक्ति संदेश स्रोत से प्राप्त संकेतों और प्रतीकों कूटनाअनुवाद का संदेश ग्रहण करता है।

    6. संदेश ग्रहणकर्त्ता ( Reciver ):- संदेश ग्रहणकर्त्ता वह होता जिसके लिए संदेश भेजा गया है। वह इस संदेश को ग्रहण करके सामने वाले की बात को समझ पाता है।

    7. पृष्ठपोषण ( Feedback ):- यह प्रयुक्त होता है जो संदेश प्राप्त करने वाला व्यक्ति संदेश प्राप्त करने के पश्चात संदेश देने वाले के पास प्रेषित करता है।

    संप्रेषण के प्रकार (Types of Communication)

    1. अनौपचारिक संप्रेषण ( Informal Communication or Grapevine Communication ) :- जब एक समूह में किसी को किसी से भी बात करने की आजादी हो तो उसे ग्रेपवाइन संप्रेषण कहते हैं। ग्रेपवाइन संप्रेषण में कोई अनौपचारिक वैज्ञानिक तरीके से बात नहीं की जाती है। इसमें सभी आजाद होते हैं कोई किसी से भी बात कर सकते हैं। उदाहरण – जब स्कूल में अवकाश होता है तो सभी बच्चे आजाद होते हैं। अतः अब आपस में किसी से भी बात कर सकते हैं।

    2. औपचारिक संप्रेषण ( Formal Communication ) :- जब बात करने का तरीका एक विधिवत और वैज्ञानिक हो उसे औपचारिक संप्रेषण कहते हैं। औपचारिक संप्रेषण में काम करने का तरीका बहुत ही सुलझा हुआ होता है और सभी अपने अपने कामों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। उदाहरण – किसी ऑफिस में जब कोई जूनियर अपने सीनियर से बात करता है।

    3. एकल / एक तरफा / वन वे संप्रेषण ( One Way Communication ) :- जब संदेश एक तरफ से ही होता है तो एकल या वन वे संप्रेषण होता है। इसमें भेजने वाला संदेश भेज देता है और प्राप्तकर्ता उसे ग्रहण कर लेता है।  उदाहरण – कक्षा में अध्यापक ने बच्चों को बोला कि वह खड़े हो जाइए तो बच्चे खड़े हो जाते हैं तो वह वन वे सम्प्रेषण हुआ।

    4. द्वितरफा / टूवे संप्रेषण ( Two Way Communication):-  जब दो व्यक्ति आपस में बातचीत करते हैं तो उन में तर्क – वितर्क होता है अर्थात प्राप्तकर्ता और भेजने वाला दोनों ही सम्मिलित होते हैं। उदाहरण – अध्यापक कक्षा में बच्चों से प्रश्न करता है तो बच्चे उसका उत्तर देते हैं तो वे टू वे संप्रेशन हुआ।

    5. अंतः वैयक्तिक संप्रेषण ( Intra Personal Communication ) :-  जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं के बारे में सोचता है तो उसे अंतः वैयक्तिक संप्रेषण कहते हैं। दूसरे शब्दों में जो व्यक्ति खुद से प्रशन करता है तो अंत वैयक्तिक संप्रेषण कहलाता है। उदाहरण – परीक्षा कक्ष में जाने से पहले विद्यार्थी खुद से बात करता है।

    6. अंतर वैयक्तिक संप्रेषण ( Interpersonal Communication ) :- जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच बातचीत होती है अर्थात जब हम दूसरों की इच्छाओं के बारे में बात करते हैं तो अंतर वैयक्तिक संप्रेषण कहलाता है। उदाहरण – मनोवैज्ञानिक और परामर्शदाता हमेशा दूसरों के बारे में बताते हैं अतः अंतर वैयक्तिक संप्रेषण हुआ।

    7. शाब्दिक संप्रेषण ( Verbal Communication ) :- शाब्दिक संप्रेषण में सदैव भाषा का प्रयोग किया जाता है। शाब्दिक संप्रेषण होता है जब मौखिक अभिव्यक्ति के द्वारा अपने शब्दों को प्रस्तुत करते हैं। हम अपने दैनिक जीवन में सबसे ज्यादा शाब्दिक संप्रेषण का ही प्रयोग करते हैं।

    8. अशाब्दिक संप्रेषण ( Non Verbal Communication ) :- जब हम इशारो चिन्हों और कूट भाषा में बातचीत करते हैं तो वह अशाब्दिक संप्रेषण कहलाता है। उदाहरण – बहरे बच्चों से हम हाथों से इशारे करके बातचीत करते हैं।

    संप्रेषण के सिद्धांत ( Principle of Communication)

    1. स्पष्टता का सिद्धांत ( Principle of Clarity ) :- संप्रेषण करते समय हमारी भाषा बिल्कुल साफ होने चाहिए। क्योंकि अगर भाषा स्पष्ट नहीं होगी तो प्राप्त करता उसका गलत अर्थ समझ बैठेंगे। इसलिए हमारी भाषा स्पष्ट होने चाहिए।

    2. समन्वय का सिद्धांत ( Principle of Coordination ) :-  प्रभावी संप्रेषण तभी हो सकता है जब संदेशों के बीच में समन्वय स्थापित हो। क्योंकि बिना समन्वय  के पहले वाले संदेश का अर्थ नहीं निकल पाएगा। अगर जब हम बातचीत करते तो समन्वय होना बहुत जरूरी है।

    3. संगतता का सिद्धांत ( Principle of Consistency ) :- जब आप बातचीत करते हैं तो संदेशों के बीच में विरोधात्मक प्रवृत्ति ना हो अर्थात दोनों संदेश एक दूसरे के विपरीत ना हो। सूचनाएं उपक्रम की नीतियों, योजनाओं तथा उद्देश्यों के अनुरूप ही होनी चाहिए।

    4. विशिष्टता का सिद्धांत ( Principle of Courtesy ) :- संप्रेषण में सूचनाएं शिष्ट एवं शालीन होनी चाहिए।  संप्रेषण के दौरान कठोर शब्द, अपशब्द और गाली-गलोच शब्द आदि प्रयुक्त नहीं करनी चाहिए।

    5. ध्यान आकर्षण का सिद्धांत ( Principle of Attention ) :-  संदेश देते समय ध्यान रखना आवश्यक है क्योंकि अगर भेजने वाले का ध्यान नहीं है तो वह गलत संदेश भी भेज सकता है। अतः संदेश देते समय ध्यान आवश्यक है।

    प्रभावात्मक संप्रेषण में बाधाएं ( Barriers of Effective Communication )

    कई बार कक्षा में संप्रेषण करते समय कुछ रुकावटों का सामना करना पड़ता है जो कि इस प्रकार है :-

    1. भौतिक बाधाएं ( Physical Barriers ) :-

    • कक्षा में शोर होना।
    • वातावरण काअच्छा न होना।
    • भौतिक असुविधाओं का होना।
    • ध्यान केंद्रित ना कर पाना।
    • स्वास्थ्य अच्छा नहीं होना।

    2. अत्याधिक भार की बाधाएं :-

    • कम महत्व की सूचनाओं को टाल देना।
    • उत्तर का अनुमान लगाना।
    • सूचना ग्रहणकर्त्ता  को अत्यधिक प्रतीक्षा कराना।
    • उत्तर देने में विलंब करना तथा सूचनाओं की उपेक्षा करना।

    3. भाषा की बाधाएं ( Language Barriers ) :-

    • शब्द भंडार की कमी।
    • अस्पष्ट शब्द बोलना।
    • अनावश्यक शब्द बोलना।
    • गलत उच्चारण करना।
    • अस्पष्ट संकेत देना।
    • किसी बीमारी का होना जैसे हकलाना, तुतलाना आदि।
    • भाषा की भिन्नता का होना।

    4. माध्यम संबंधी बाधाएं ( Medium Related Barriers ) :-

    • माध्यम में तकनीकी खराबी का होना। उदाहरण – टेलीफोन का खराब होना।
    • गलत माध्यम का चयन करना।
    • माध्यम प्रयोग करने का पता नहीं होना।

     5. मनोवैज्ञानिक बाधाएं ( Psychological Barriers ) :-

    • रुचि का ना होना।
    • ध्यान न देना।
    • गलत प्रत्यक्षीकरण
    • अपूर्ति जिज्ञासा।
    • अलाभकर अनुभव।

    6. पृष्ठभूमि की बाधाएं ( Background Barriers ) :-

    • पूर्व अधिगम का अच्छा नहीं होना।
    • पूर्व कार्य स्थिति का वातावरण।
    • पूर्व ज्ञान को नए ज्ञान के साथ में न जोड पाना।
    • बच्चों को पहले से बात करना नहीं सिखाना।

    7. प्रबंधकिए बाधाएं ( Management Barriers ) :-

    • कर्मचारियों के साथ अच्छा व्यवहार ने होना।
    • समय समय पर निर्देशन का न होना।
    • छोटे स्तर के कर्मचारियों को कम समझना।
    • कमीशन का कम होना।
    • काम करने का स्थान अच्छा न होना।

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    शुभकामनाएँ…!!! 👍👍👍

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