हिंदी में शिक्षण और सीखने की बुनियादी प्रक्रिया

बहुत से हिंदी भाषी छात्र इन्टरनेट पर हिंदी में शिक्षण और सीखने की बुनियादी प्रक्रिया सर्च करते हैं, उनके लिए हमने बेहद सटीक नोट्स हिंदी में शिक्षण के ऊपर तैयार किया है।

आलेख में आप हिंदी में शिक्षण और सीखने की बुनियादी प्रक्रिया से जुड़ी चीजें जैसे शिक्षण अभिक्षमता, शिक्षण के स्तर, शिक्षण के चरणों को डिटेल्स में जान पाएँगे।

Page index
1.Basic Process of Teaching and Learning in Hindi (शिक्षण अधिगम की मूल प्रक्रियाएं)
2.पाठ्यक्रम की विशेषताएं (Characteristics of Curriculum)
3.शिक्षण सूत्र (Teaching rules)
4.अध्यापन क्षेत्र में कोर्स
5.शिक्षण की विशेषताएं (Characteristics of teaching)
6.सूक्ष्म शिक्षण चक्र (Cycle of microteaching)
7.शीर्ष कॉलेज
8.यह भी पढ़ें
9.अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Basic Process of Teaching and Learning in Hindi (शिक्षण अधिगम की मूल प्रक्रियाएं)

हिंदी में शिक्षण और सीखने की बुनियादी प्रक्रिया सोद्देश्य  प्रक्रिया है। किसी ने किसी विशिष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही शिक्षण की विभिन्न क्रियाओं का आयोजन किया जाता है। शिक्षण का अर्थ है लक्ष्य को साधते हुए किसी को सिखाना। शिक्षण को एक त्रि-ध्रुवीय प्रक्रिया माना गया है। शिक्षण के लिए हमें छात्र अध्यापक और पाठ्यक्रम की जरूरत पड़ती है। इसी वजह से शिक्षण को त्रि ध्रुवीय प्रक्रिया माना गया है।

 शिक्षण की परिभाषाएं

हफ  तथा डंकन के अनुसार – शिक्षण चार चरणों वाली प्रक्रिया है योजना, निर्देशन, मापन तथा मूल्यांकन।

बर्टन  के अनुसार – शिक्षण अधिगम हेतु प्रेरणा, पथ प्रदर्शन व प्रोत्साहन है।

 पाठ्यक्रम की विशेषताएं (Characteristics of Curriculum)

1.पाठ्यक्रम लचीला होना चाहिए।
2.पाठ्यक्रम सामाजिक आवश्यकता के अनुसार होना चाहिए।
3.पाठ्यक्रम अभ्यास पर आधारित होना चाहिए।
4.पाठ्यक्रम पूर्व ज्ञान पर आधारित होना चाहिए।
5.पाठ्यक्रम मानसिक स्तर के अनुसार होना चाहिए।
6.पाठ्यक्रम नैतिक मूल्य पर आधारित होनाचाहिए।

शिक्षण सूत्र (Teaching rules)

  1. ज्ञात से अज्ञात की ओर (Known to unknown) :- पढ़ाने से पहले अध्यापक को प्रश्न करके पता कर लेना चाहिए कि बच्चों को उस पाठ के प्रति कितना ज्ञान है। पता करने से अध्यापक को कक्षा का स्तर पता चल जाता है। ज्ञान पता होने पर बच्चों को वहां तक पढ़ाना है जो बच्चे नहीं जानते हैं।हिंदी में शिक्षण और सीखने की बुनियादी प्रक्रिया ही यही है |
  2. सरल से कठिन की ओर (Easy to complex) :- पहले अध्यापक को सरल रचनाएं प्रस्तुत करनी चाहिए उसके बाद उससे थोड़ा सा ऊपर का स्तर तथा बिलकुल अंत में मुश्किल रचनाएं प्रस्तुत करनी चाहिए। क्योंकि अगर अध्यापक शुरू में ही कठिन रचनाएं प्रस्तुत करते हैं तो बच्चों का विश्वास डगमगा जाता है।
  3. विशिष्ट से सामान्य की ओर (Specific to general) :- अध्यापक को सबसे पहले पाठ का विशिष्ट रुप प्रस्तुत करना चाहिए। उसके बाद उसका सामान्य रूप प्रस्तुत करना चाहिए क्योंकि बच्चों को विशेष रुप पर ज्यादा ध्यान देने की आदत होती है।
  4. मूर्त से अमूर्त / स्थूल से सूक्ष्म की ओर (Concrete to abstract) :- बच्चा पहले अपनी सामने रखी हुई वस्तु पर ध्यान केंद्रित करता है। उसके बाद उनको हटाने पर भी ध्यान केंद्रित कर सकता है बच्चा उन चीजों के ऊपर तार्किक रूप से नहीं सोच सकता जो उसने पहले नहीं देखी हुई है अतः पहले बच्चों को वस्तुएँ दिखानी चाहिए बाद में उन को हटाकर उन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बोलना चाहिए।
  5. पूर्ण से अंश की ओर (Whole  to  partial) :- अध्यापक को पहले पूरे भाग की जानकारी देनी चाहिए बाद में उसके छोटे छोटे भागों की जानकारी देनी चाहिए उदाहरणार्थ – पहले गाड़ी के बारे में फिर उसके भागों के बारे में बताना।
  6. अनिश्चितता से निश्चितता की ओर (Unsure to sure) :- बच्चा किसी भी नए सम्प्रत्य को लेकर हमेशा भ्रांति में रहता है। बच्चों की भ्रांति को ध्यान में रखकर उसको ज्ञान देना चाहिए ताकि उसके प्रति निश्चित हो जाए।
  7. बाल केंद्रित के अनुसार (According to child centred ) :- अध्यापक को बाल केंद्रित शिक्षा को ध्यान में रखकर शिक्षा देने चाहिए। बच्चों को अनुभूतियों व्यवहार तथा रुचियों को ध्यान में रखकर शिक्षा देनी चाहिए।
  8. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर (Differentiation analysis to synthesis) :-  विश्लेषण का अर्थ होता है टुकड़ों में तोड़ना और संश्लेषण का अर्थ होता है जोड़ना। उदाहरणार्थ – जब हम किसी कविता का अनुवाद करते हैं तो एक-एक शब्द को तोड़ कर लिखते हैं और जब हम उसके निष्कर्ष देते हैं तो पूरी कविता का निचोड़ बताते हैं।
  9. मनोविज्ञान से तार्किक की ओर (Psychological to logical) :- पहले अध्यापक को मनोविज्ञान तरीके से बच्चों को तैयार करना चाहिए कि उसको पढ़ाई करनी है अगर वह मनोवैज्ञानिक आधार बनाकर पड़ेगा तो वे रुचि के साथ पढ़ता हुआ तर्क प्रस्तुत कर सकता है।

अध्यापन क्षेत्र में कोर्स

  • D.Ed (Diploma in education)
  • B.Ed (Bachelor in education)
  • M.Ed (Master in education)
  • BTC (Basic training certificate)
  • NTT( Diploma in Nursery teacher training)
  • DPE( Director of Physical Education)
  • B.P.ED(Bachelor of Physical Education)

शिक्षण की विशेषताएं (Characteristics of teaching)

1.शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है।
2.शिक्षण एक भाषाई प्रक्रिया है।
3.शिक्षण एक अंतक्रिया है।
4.शिक्षण एक कला है।
5.शिक्षणिक विकास की प्रक्रिया है।
6.शिक्षण एक त्रि ध्रुवीय प्रक्रिया है।

 सूक्ष्म शिक्षण (Micro teaching)

एलन के अनुसार – सूक्ष्म शिक्षण से तात्पर्य शिक्षण क्रिया के उस सरलीकरण लघु रूप से है जिसे थोड़े विद्यार्थियों वाली कक्षा के सामने अल्प समय में संपन्न किया जाता है

बी के पासी एवं M S ललिता के अनुसार – जिसमें छात्राध्यापकों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनके द्वारा किसी एक सम्प्रत्य के थोड़े से विद्यार्थियों को अल्प समय में विशिष्ट शिक्षण कौशलों का प्रयोग करके पढ़ाया जाए।  

सूक्ष्म शिक्षण अध्यापकों का शिक्षण कौशलों का अभ्यास कराने हेतु अपनाई गई एक प्रशिक्षण तकनीक है। यह शिक्षण एक अति छोटा रूप है जिसमें वास्तविक शिक्षण की जटिलताओं को कम करने के हर संभव प्रयत्न किए जाते हैं। यह शिक्षण छात्रों के छोटे छोटे समूहों में होता है

 सूक्ष्म शिक्षण चक्र (Cycle of microteaching)

 एनसीईआरटी के अनुसार :-

सत्रसमय
शिक्षण सूत्र (Teaching sessions)6 मिनट
प्रतिपुष्टि सत्र (Feedback session)6 मिनट
पुनर्योजना सत्र (Re-Plan Session)6 मिनट
 पुनः अध्यापन सत्र (Re-Teach session)6 मिनट
पुनः प्रतिपुष्ठी सत्र (Re-Feedback session)6 मिनट
कुल समय36  मिनट

शीर्ष कॉलेज

S.no:संस्थान के नामराज्य
1.Government College of Education Chandigarhचंडीगढ़
2.SNDT Women University Mumbaiमुंबई
3.Ignou New Delhiदिल्ली
4.Aligarh Muslim University, Department of Education Aligarhअलीगढ
5.Jamia Millia Islamia University Delhiदिल्ली
6.University of Delhiदिल्ली
7.University of Mumbaiमंबई
8.University of Rajasthanराजस्थान
9.University of Calcuttaकलकत्ता
10.SNDT Women’s Universityमहाराष्ट्र

यह भी पढ़ें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.1. क्यों शिक्षण एक बुरा काम है?

उत्तर: क्यों शिक्षण एक बुरा काम है? पब्लिक स्कूल टीचर बनना एक बुरा काम है। इसके 3 मुख्य कारण हैं:
1) कक्षाएं बहुत बड़ी हैं।
2) छात्रों के पास बहुत अधिक शक्ति है।
3) माता-पिता या तो शिक्षा की परवाह नहीं करते हैं या किसी कारण से आपसे खुश नहीं हैं

प्र.2. शिक्षण के क्या लाभ हैं?

उत्तर: यहाँ शिक्षक बनने के 9 फायदे हैं!
1. अपने जुनून साझा करें।
2. दूसरों को प्रेरित करें।
3. एक वास्तविक अंतर बनाओ।
4. चीजें अलग तरीके से करें।
5. शिक्षा का भविष्य बदलें।
6.शिक्षकों का एक समुदाय
7. आदर्श कार्य के घंटे।
8. हर साल ताजा शुरुआत।

प्र.3. क्यों शिक्षण सबसे अच्छा काम है?

उत्तर: हिंदी में शिक्षण सबसे पुरस्कृत व्यवसायों में से एक है। कई कारण हैं कि शिक्षक अपने पेशे से प्यार क्यों करते हैं। छात्रों को देखकर अंत में एक सफलता मिलती है और कुछ समझ में आता है कि वे संघर्ष कर रहे हैं जिससे शिक्षक दैनिक कार्य पर अपने काम के प्रत्यक्ष प्रभाव को महसूस कर सकते हैं।

प्र.4. क्या सभी शिक्षकों का भुगतान समान है?

उत्तर: यह अब तक एक परिचित कहानी है, जिसे अक्सर एक विलाप के रूप में बताया जाता है: इस देश में शिक्षकों को एकल वेतन अनुसूची के अनुसार भुगतान किया जाता है। वे वर्षों के अनुभव और अर्जित कॉलेज इकाइयों के आधार पर बेहतर वेतन अर्जित करते हैं। … वास्तव में, क्लासिक शिक्षकों के वेतन की व्यवस्था सिविल सेवा की एक कलाकृति है।

प्र.5. क्या एक तनावपूर्ण करियर सिखा रहा है?

उत्तर: एक अध्ययन में पाया गया है हिंदी में शिक्षण कि अन्य पेशेवरों की तुलना में शिक्षकों को नौकरी से संबंधित तनाव का शिकार होने की अधिक संभावना है। पांच में से एक शिक्षक अपनी नौकरी के बारे में सभी या ज्यादातर समय तनाव महसूस करता है, एक ही पेशे में आठ श्रमिकों के साथ तुलना में, नेशनल फाउंडेशन फॉर एजुकेशनल रिसर्च द्वारा विश्लेषण से पता चला है|


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