सिंघाड़े की खेती: कैसे करें, क़िस्म, मुनाफा, फायदे, ख़र्च, जलवायु, कहाँ बेचे इत्यादि।

सिंघाड़े की खेती: सिंघाड़ा यानि पानी फल हम सब अकसर गाँव में तालाब में हरे रंग के पत्ते की बेल को देखते हैं जो की कुछ महीने के बाद हट जाते हैं। बाजार में जाते समय हमने कई बार इस फल को खरीदा भी है। खाने के लिहाज से बहुत ही स्वादिष्ट भी होता है। आईये जानते हैं इसकी खेती से जुडी कुछ विशेष जानकारी। इसकी फसल पुरे साल तक ली जा सकती है। सिघाड़े का आटा व्रत में खाया जाता है और उसके दाम भी बढ़िया मिलते हैं। सूखे सिघाड़े की कीमत 100 रूपए प्रति किग्रा से लेकर 120 रूपए तक भी पहुंच जाती है। यह आपको उत्तर प्रदेश के कई जिलों तथा बिहार में भी अधिक मात्रा में देखा जा सकता है।

सिंघाड़े की उपयोगिता

जहाँ भारत में सिंघाड़े से खाने के साथ साथ आटा बनाया जाता है और मुख्यत व्रत के दौरान इसका सेवन किया जाता है उसी तरह कई एशियाई देशों में सिंघाड़े का उपयोग बहुत से एशियाई व्‍यंजनों जैसे हलचल-फ्राइज, काट, सूई करी और सलाद के लिए प्रमुख रूप से उपयोग किया जाता है। सिंघाड़े के कई उपयोग है और इसके फायदे भी बहुत हैं।

सिंघाड़े को खाने से होने वाले फायदे

  • शोध कर्ताओं के अनुसार सिंघाड़ा मैंगनीज का अवशोषक करने में सक्षम होता है जिससे शरीर को मैंगनीज का भरपूर लाभ मिलता है। यह पाचन तंत्र के लिए बढ़ि‍या है साथ ही बुढ़ापे में होने वाली कई बीमारियों से भी बचाता है।
  • गर्भावस्था में ये एक लाभप्रद साबित होता है इसे खाने से होने वाले शिशु को कई तरह के पोषक तत्व मिलते हैं।
  • पीलिया में काफी मददगार साबित होता है इसका जूस अगर रोगी को पिलायें तो रोगी जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है।
  • अस्थमा के मरीजो के लिए भी काफी लाभदायक सिद्ध होता है ये इसे खाने से रोगी को फायदा मिलता है।
  • बवासीर के समय पर भी ये काफी कारागार साबित होता है इसके सेवन करने से रोग को जड़ से सम्पात किया जा सकता है।

सिंघाड़े खाने से होने वाले कुछ नुक्सान

  • जैसा की हम सब जानते हैं की ये एक मौसमी फल कई तरह के मौसमी फलों में कई तरह की बीमारियाँ भी होती हैं इसलिए इसको खाने से भी कुछ नुक्सान होता है जो की निम्न है।
  • अत्यधिक इसके सेवन से पाचन तंत्र ख़राब हो सकता है इससे बचें।
  • इसको खाने के तत्पश्चात पानी पीने से बचना चाहिए क्यों की उससे भी खासी सर्दी की सम्भावना बनी रहती है।
  • आँतों में भी सुजन आने का खतरा बना रहता है।

बीज कहाँ से ले सकते हैं

बीज खरीदने के लिए हम बीज भंडारण केंद्र से खरीद सकते हैं या अपनी राज्य बीज भंडारण केंद्र से सीधे संपर्क करके खरीद सकते हैं।

सिंघाड़े में मिलने वाले तत्व

प्रति 100 ग्राम फल में मिलने वाले तत्व

पानी 70%कार्बोहाइड्रेट 23%प्रोटीन 4.70%वसा 0.30%रेशा 0.60%खनिज 1.4%

इसकी बुवाई की सही समय अवधि

जून-जुलाई माह में जब तालाबों में पानी इकट्ठा हो जाये तो लट्टे के सहायता से मिट्टी में छोटे-छोटे गड्ढे बनाकर पौध की रोपाई करते है। बरसात के मौसम में यह तेज़ी से पनपता है इसलिए कोशिश करें की बरसात के समय में इसकी बुवाई कर सकें।

उन्नत बीज की किस्में

लाल (वी.आर.डब्लू.सी.-1 और 2/VRWC-1, 2) तथा हरे (वी.आर.डब्लू.सी.-3/VRWC-3) आदि

खेत या तालाब की तैयारी कैसे करें

आप जहा भी इसकी खेती करना चाहते है चाहे खेत हो या तालाब सबसे पहले तो उस स्थान को सही से साफ़ करा लें बाद में एक लकड़ी से तालाब या फिर खेत के गद्दे में छेद करें ताकि वह बीज को बोया जा सके। 60-120 सेमी तक पानी का जमाव जून से जनवरी तक रहता है।

सामान्यतः इसकी खेती तालाब, पोखरों, छोटे-छोटे गड्ढों में की जाती है।

सिंघाड़े के प्रकार: ये मुख्यत दो प्रकार के होते है एक लाल रंग के छिलके वाले और काले रंग के छिलके वाले।

भारत के वो राज्य जहाँ पर इसे उगाया जाता है

इसकी खेती उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा एवम मध्य प्रदेश में उन जगहों पर की जाती है। बिहार का दरभंगा जिला इसकी खेती के लिए प्रसिद्ध है बेबाक किसान के माध्यम से हमने एक वह निवासी मछुवारा समुदाई के लोग से बात चीत की जिससे पता चला की ये लोग एक तालाब (पोखर) से अपनी साल भर की आमदनी करके अछि बचत कर रहे हैं। इनके अनुसार से यह तालाब से एक साल में मछली पालन, सिंघाड़ा खेती व मखाना उत्पादन करके व्यवसायिक स्तर की खेती करते हैं। यहाँ कई तालाब मालिकों का कहना है की तालाब कभी भी खली नहीं रहता। पुरे साल कुछ न कुछ फसल लगी होती हैं। यहाँ तक की बेबाक किसान कनेक्शन से की बातचीत में इन्होने बताया की कुछ लोग अपने खेत को भी अब तालाब में परवर्तित करने लगे हैं।

इसे जरुर पढ़ें – डॉ विजयश्री प्रसाद (इंडियन डायेटिक एसोसएिशन की सीनियरडायटिशियन) के अनुसार सिंघाड़ा के आटे का प्रयोग कई प्रकार की दवाओं के बनाने में भी किया जाता है जिससे इसकी मांग में भी बढ़ोतरी हुई है। थॉयरायड और घेंघा रोग को दूर करने में इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, चूंकि इसमें आयोडीन अधिक पाया जाता है इसलिए इन बीमारियों से ग्रसित मरीजों के लिए यह फायदेमंद है।

फसल की तुड़ाई

सिंघाड़े की फसल की तुड़ाई की कोशिश होनी चाहिए की दुर्गा पूजा से कम से कम एक सप्ताह पहले की जाये ये एक व्यवसायिक गड़ना के आधार पर है इससे लाभ मिलता है क्यों की हिन्दू मान्यता में वर्त पूजा पाठ का सबसे महत्वपूर्ण समय वही होता है जिससे की फल का भी दाम मिले और उसका आटा भी बेचा जा सके। सिंघाड़े के पौधों पर सितम्बर माह में फूल आने लगते है एवं अक्टूबर के पहले सप्ताह से सब्जी योग्य फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं। दस से पंद्रह दिनों के अन्तराल पर लगभग 10 तुड़ाई की जाती है अगर सब कुछ ठीक रहा तो लगभग एक हेक्टेयर से लगभग 25 से 30 टन फल प्राप्त किया जा सकता है।

माल कहाँ बेच सकते हैं

माल आप अपने अनुसार कही भी बेच सकते हैं अधिकतर किसान इसे उगाकर फल के रूप में बेचते हैं अगर आप चाहें तो इसको सुखाकर इसका आटा तैयार करके अपनी पैकिंग करके भी बेच सकते हैं। आप इसको ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों के माध्यम से बेच सकते हैं। इसके लिए आप सीधे जाकर मंडी से संपर्क करके अपना आटा वह के व्यापारियों को बेच सकते हैं या आप चाहें तो ऑनलाइन भी सेल कर सकते हैं इसके लिए आप फ्लिप्कार्ट, अमेज़न से संपर्क करके अपना आटा सीधा कस्टमर को बेच सकते हैं और एक अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

आशा करते है सिंघाड़े से जुडी यह लेख आपको पसंद आयी होगी। अपने किसान भाईयों को जागरूक कर स्वरोज़गार मुहैया कराने हेतु शुरुवात की गयी इस मुहीम से जुड़े रहने के लिए हमें सब्सक्राइब करना न भूले। इसी तरह की जानकारी पाने के लिए एडुफ़ीवर ग्रामीण शिक्षा को अपना सहयोग दे। सिंघाड़े के उत्पादन से जुड़ी किसी भी तरह के समस्याओं के समाधान हेतु नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में कमेंट करना न भूले।

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