राजमा की खेती: कैसे करें, कितना मुनाफा, इसके फायदे, कहाँ बेचे इत्यादि।

राजमा की खेती, rajma ki kheti
राजमा की खेती

राजमा की खेती: हिन्दुस्तान कई धर्मों का देश है जहाँ सब मजहब के लोग प्यार से आपस में मिलकर रहते हैं। खाने पीने के मामले में भी यहाँ हर धर्म के लोग अपने खान पान को खाने और खिलाने के भी शौक़ीन होते हैं। राजमा चावल का स्वाद आखिर कौन नहीं जानता होगा। पर क्या आपने कभी सोंचा है की ये राजमा की खेती आखिर कैसे की जाती है। पंजाब प्रांत के मशहूर खान पान में इसका विशेष दर्जा है।

राजमा का पौधा एक लैगुमिनोसी कुल का पौधा है, जिसका की उपकुल पेपिलियोनेसी है। राजमा का पौधा झाड़ीनुमा और बेल के आकार में बढ़ता है। जिसमें अच्छी तरह विकसित मूसला जड़ होती है। पुष्पक्रम एक कक्षीय-असीमाक्ष होता है, जिसमें अनेक पुष्प होते है। बीज का आकार अधिकतर आयताकार या गुर्दे के आकार का होता है।

राजमा खाने से होने वाले कुछ अदभुत फायदे

  • ब्लड प्रेशर पर कंट्रोल: राजमा में पाए जाने वाले अभी पोषक तत्व जैसे पोटेशियम, मगेनिसियम, प्रोटीन और फाइबर हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में बहुत मदद करते हैं और इसे सेवन से हाई ब्लड प्रेशर से भी निजाद मिल जाता है।
  • कैंसर से बचाव: राजमा में पाए जाने वाले तत्व और एंटी ओक्सिडेंट हमारे शरीर की बहुत सी बीमारी को दूर करता है, साथ ही इसके सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को भी दूर किया जा सकता है। इसलिए राजमा का इस्तेमाल हमे जरुर करना चाहिए क्यों की शरीर को सभी तत्वों की जरुरत होती है।
  • हड्डियाँ मजबूत बनाये: राजमा में कैल्शियम और प्रोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है जो हमारे शरीर की हड्डियों को मजबूत बनाने में बहुत मदद करते हैं। इसलिए इसका सेवन सभी को करना चाहिए। बच्चों को राजमा जरुर खिलाना चाहिए। इससे हमारा शरीर मजबूत और दिमाग भी तेज होता है।
  • डायबिटीज: दोस्तों राजमा खाने से सरीर में जरुरी तत्व मिल जाते हैं और इसके सेवन से मधुमेह के बहुत फायदा होता है क्यूं कि राजमा में भरपूर मात्रा में फाइबर और प्रोटीन पाया जाता है जो की डायबिटीज के लिए लाभकारी है। इसके इस्तेमाल से ब्लड सुगर लेवल भी इस्तिथ में रहता है।
  • कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल: राजमा में पाए जाने वाले एंटी ओक्सिडेंट हमारे सरीर में बढे हुए कोलेस्ट्रॉल को ख़त्म करता हैं और कोलेस्ट्रॉल को इससे सामान्य किया जा सकता है। इसके सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है और हार्ट से related बीमारी नही होती साथ ही खून भी साफ़ रहता है।
  • वजन कम करे: राजमा खाने से शरीर में जरुरी पोषक तत्व की कमी दूर हो जाती है और आपको बताये की इसमें कैलोरी बहुत कम मात्रा में पाई जाती है जिससे अगर राजमा का सेवन किया जाये तो मोटापा नही आता और शरीर का वजन भी कण्ट्रोल में रहता है। इसलिए इसका इस्तेमाल कोई भी कर सकता है।

राजमा की खेती करने के लिए उपयुक्त जलवायु

पहले की तुलना में राजमा की खेती करना अब अधिक आसन साबित होता है। पहले ये सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों तक ही सीमित थी पर अब लगभग सभी प्रकार की जलवायु में इसकी खेती करना संभव हो गया है।

यह फसल सालाना 60 से 150 सेमी बारिश वाले उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण क्षेत्रों में अच्छी तरह से बढ़ती है। बेहतर उपज के लिए आदर्श तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से 25 डिग्री सेल्सियस तक का होता है।

सही भूमि का चुनाव

भूमी का चुनाव सही कार्बनिक गुणों वाली चिकनी लवण युक्त मिट्टी जिसका की ph मान 5.5 से 6.0 हो उसको सबसे बेहतर माना जाता है।

राजमा की खेती का सही समय

भारत के विभिन्न हिस्सों में रबी और खरीफ दोनों सीजन में लाल राजमा की खेती की जाती है। राजमा की खेती का बुवाई का मौसम अलग अलग राज्य पर भिन्न होता है। जिनमे यूपी और बिहार के क्षेत्रों में नवंबर की पहली और दूसरे पखवाड़े में होता है और महाराष्ट्र में अक्टूबर के मध्य का समय अनुकूल होता है। प्रारंभिक किस्मों को अक्टूबर के अंत में बोया जा सकता है जहाँ देर तक की जाने वाली किस्मों को नवंबर तक बोया जा सकता है। खरीफ सीजन की फसल के लिए, मध्य मई से लेकर मध्य जून तक का मौसम सबसे अच्छा है। इसके अलावा वसंत ऋतु की फसल के लिए, फरवरी से मार्च  के पहले सप्ताह में बुवाई के लिए सबसे अच्छा होता है।

बीज कहाँ से खरीदें

बीजों का सही चुनाव अति आवश्यक है। बीज खरीदने के लिए सबसे पहले सही मात्रा और सही गुणवता का ध्यान देना बेहद ज़रूरी है। बीज खरीदने के लिए आप राज्य की बीज भण्डार केंद्र से खरीद सकते हैं या आप किसी सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थान से सीधे तौर पे खरीद सकते हैं।

बुवाई करने की सही विधि

राजमा के बीज की मात्र 120 से 140 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर लगती है। बीजोपचार 2 से 2.5 ग्राम थीरम से प्रति किलोग्राम बीज की मात्र के हिसाब से बीज शोधन करना चाहिए।

बुवाई का सही समय

राजमा की बुवाई अक्टूबर का तीसरा और चौथा सप्ताह बुवाई हेतु सर्वोत्तम माना जाता है। इसकी बुवाई लाइनो में करनी चाहिए। लाइन से लाइन की दूरी 30 से 40 सेंटीमीटर रखते है, पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखते है, इसकी बुवाई 8 से 10 सेंटीमीटर की गहराई पर करते है।

सिंचाई करने की सही विधि

राजमा में 2 या 3 सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। बुवाई के 4 सप्ताह बाद प्रथम सिंचाई हल्की करनी चाहिए। बाद में सिंचाई एक माह बाद के अंतराल पर करनी चाहिए खेत में पानी कभी नहीं ठहरना चाहिए।

खरपतवार पर नियंत्रण

सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। गुड़ाई के समय थोड़ी मिट्टी पौधों पर चढ़ाना चाहिए ताकि पौधों पर फलियां लगाने पर पौधे गिर न सके। खरपतवार नियंत्रण हेतु बुवाई के बाद तुरंत ही उगने से पहले पेंडामेथलीन का छिड़काव 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

रोगों से फसल का बचाव

राजमा की पत्तियो पर मुजैक दिखते ही रोगार या डेमेक्रांन को 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। रोगी पौधों को प्रारम्भ में ही निकाल देना चाहिए साथ में डाईथेंन जेड 78 या एम् 45 को मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। राजमा में जैसे कि सफ़ेद मक्खी एवं माहू कीट लगते है। इनके रोकने के लिए कीटनाशक 1.5 मिलीलीटर रोगार या डेमोक्रान का छिड़काव करना चाहिए।

फसल की कटाई कब करनी चाहिए

राजमा की जब फलियां 125 से 130 दिन में जब पक कर तैयार हो जाये तब कटाई करके एक दिन के लिए खेत में पडी रहने देना चाहिए। बाद में मड़ाई करके दाना निकाल लेना चाहिए। अधिक सूखने पर फलियों से दाना चटककर बीज गिरने लगते है।

पैदावार में बढोतरी

तकनीकियो का प्रयोग करते हुए राजमा की खेती में सामान्य रूप से 15 से 20 कुंतल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

माल को कहाँ बेचें

माल को बेचने के लिए आपको किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए अगर आप चाहें तो माल को मंडी जाकर सीधे तौर पे भी बेच सकते हैं। अगर आप खुद की पैकिंग करके बेचना चाहें तो किया जा सकता है। आप इसे अपने अनुसार रिटेल या होलसेल दोनों तरीके से बेच सकते हैं। आप ऑनलाइन के माध्यम से भी इसे बेच सकते हैं ऑनलाइन बेचने के लिए आप फ्लिप्कार्ट, आमेज़न, बिगबास्केट, इंडिया मार्ट कम्पनी से सीधे तौर पे बेच सकते हैं और एक अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

आशा करते है राजमा की खेती से जुड़ी यह लेख आपको पसंद आयी होगी। अपने किसान भाईयों को जागरूक कर स्वरोज़गार मुहैया कराने हेतु शुरुवात की गयी इस मुहीम से जुड़े रहने के लिए हमें सब्सक्राइब करना न भूले। इसी तरह की जानकारी पाने के लिए एडुफ़ीवर ग्रामीण शिक्षा को अपना सहयोग दें। राजमा के उत्पादन से जुड़ी किसी भी तरह के समस्याओं के समाधान हेतु नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में कमेंट करना न भूले।

चित्र साभार: placeoforigin

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